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भगवद गीता 15.5

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः। द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥

अहंकार और मोह से मुक्त, आसक्ति के दोष पर विजय पाए हुए, सदा आत्मा में स्थित, इच्छाओं से विमुख, सुख-दुख के द्वंद्वों से मुक्त, ऐसे अज्ञान-रहित लोग उस अविनाशी धाम तक पहुँचते हैं।
  • ego
  • attachment
  • wisdom
  • freedom

यह श्लोक किस बारे में है

यह श्लोक भगवद गीता के अध्याय 15 से है।

चिंतन

यहाँ आज़ादी का मतलब ज़िंदगी से भागना नहीं है। इसका मतलब है, उसके हर हिस्से में कम फँसना।

एक छोटा अभ्यास

आज जब कोई चीज़ तुम्हें जकड़े, कोई टिप्पणी, कोई लालसा, रुको। पूछो, यह तुमसे क्या ले जाना चाहती है।

अध्याय 15

पुरुषोत्तम योग

एक उल्टा वृक्ष, जिसकी जड़ें ऊपर हैं। ऐसी ज़िंदगी की तस्वीर जो अचल में जमी है, जबकि शाखाएँ हवा में हिलती रहती हैं।

ये मन के सवाल जिनसे यह श्लोक जुड़ता है

ऐसे सवाल जो असली लोग मन में उठाते हैं, और जिन पर यह श्लोक कुछ कहता है।

इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।

धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।

15.5 पर धर्म से पूछें