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भगवद गीता 2.13

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा। तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥

जैसे देहधारी आत्मा इसी शरीर में बचपन, जवानी और बुढ़ापे से होकर गुज़रती है, वैसे ही मृत्यु पर वह दूसरे शरीर में चली जाती है। विवेकी इससे मोहग्रस्त नहीं होते।
  • grief
  • death
  • loss
  • change
  • impermanence

यह श्लोक किस बारे में है

यह श्लोक भगवद गीता के अध्याय 2 से है।

चिंतन

तुम पहले भी अपने कई रूप जी चुके हो। हर रूप की चिंताएँ गुज़र गईं। यह भी गुज़र जाएगी।

एक छोटा अभ्यास

आज जब कोई चिंता बहुत बड़ी लगे, तो ख़ुद से पूछो: क्या यह पाँच साल बाद भी मायने रखेगी?

अध्याय 2

सांख्य योग

कृष्ण यहाँ अमर आत्मा का परिचय देते हैं, कर्म के कर्तव्य की बात करते हैं, और उस मन का आदर्श रखते हैं जो सुख और दुख दोनों में स्थिर रहे।

इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।

धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।

2.13 पर धर्म से पूछें