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भगवद गीता 2.27

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥

जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है, और जो मर चुका है उसका जन्म भी निश्चित है। इसलिए जो टाला नहीं जा सकता, उस पर शोक करना उचित नहीं।
  • grief
  • death
  • acceptance

यह श्लोक किस बारे में है

यह श्लोक भगवद गीता के अध्याय 2 से है।

चिंतन

दुख कोई ग़लती नहीं है। यह किसी सच्ची चीज़ से प्यार करने की क़ीमत है।

एक छोटा अभ्यास

अगर तुम दुख में हो, तो एक बार धन्यवाद कहो, उसके लिए जो कभी यहाँ था।

अध्याय 2

सांख्य योग

कृष्ण यहाँ अमर आत्मा का परिचय देते हैं, कर्म के कर्तव्य की बात करते हैं, और उस मन का आदर्श रखते हैं जो सुख और दुख दोनों में स्थिर रहे।

इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।

धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।

2.27 पर धर्म से पूछें