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भगवद गीता 3.19

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर। असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥

इसलिए बिना आसक्ति के, हमेशा वह काम करो जो करना चाहिए। बिना आसक्ति के कर्म करने से मनुष्य परम को पा लेता है।
  • duty
  • action
  • career
  • results

यह श्लोक किस बारे में है

यह श्लोक काम और करियर और नतीजों से जुड़ता है।

चिंतन

कर्तव्य जो चुपचाप, बिना शिकायत के किया जाए, वह सबसे मुक्त एहसासों में से एक है।

एक छोटा अभ्यास

आज एक ज़िम्मेदारी बिना शिकायत के निभाओ, मन में भी नहीं।

अध्याय 3

कर्म योग

क्यों कोई भी कर्म से पूरी तरह बाहर नहीं निकल सकता, और कैसे संसार में कर्म करते हुए भी उससे न बँधा जाए।

ये मन के सवाल जिनसे यह श्लोक जुड़ता है

ऐसे सवाल जो असली लोग मन में उठाते हैं, और जिन पर यह श्लोक कुछ कहता है।

इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।

धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।

3.19 पर धर्म से पूछें