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भगवद गीता 2.48

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥

हे धनंजय, योग में स्थित होकर, आसक्ति त्यागकर अपने कर्म करो, सफलता और असफलता में समान रहते हुए। मन की यही समता योग कहलाती है।
  • equanimity
  • results
  • anxiety
  • career

यह श्लोक किस बारे में है

यह श्लोक नतीजों, चिंता और काम और करियर से जुड़ता है।

चिंतन

समता का मतलब ठंडा हो जाना नहीं है। इसका मतलब है, तुम चीज़ों को पूरी तरह महसूस कर सको, पर उनसे इधर-उधर न बहो।

एक छोटा अभ्यास

आज जब कुछ अच्छा या बुरा हो, तो प्रतिक्रिया देने से पहले 30 सेकंड रुको।

अध्याय 2

सांख्य योग

कृष्ण यहाँ अमर आत्मा का परिचय देते हैं, कर्म के कर्तव्य की बात करते हैं, और उस मन का आदर्श रखते हैं जो सुख और दुख दोनों में स्थिर रहे।

ये मन के सवाल जिनसे यह श्लोक जुड़ता है

ऐसे सवाल जो असली लोग मन में उठाते हैं, और जिन पर यह श्लोक कुछ कहता है।

गहरा चिंतन

इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।

धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।

2.48 पर धर्म से पूछें