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भगवद गीता 2.62

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

विषयों पर सोचते-सोचते उनमें आसक्ति हो जाती है; आसक्ति से इच्छा जन्म लेती है, और इच्छा से क्रोध पैदा होता है।
  • anger
  • desire
  • attachment
  • overthinking

यह श्लोक किस बारे में है

यह श्लोक भगवद गीता के अध्याय 2 से है।

चिंतन

आज तुम्हें जो ग़ुस्सा आ रहा है, उसमें से अधिकतर एक-दो घंटे पहले एक छोटी-सी चाहत के रूप में शुरू हुआ था।

एक छोटा अभ्यास

जब ग़ुस्सा आए, तो पूछो: मैं क्या चाहता था जो नहीं मिला? उस चाहत के साथ बैठो, ग़ुस्से के साथ नहीं।

अध्याय 2

सांख्य योग

कृष्ण यहाँ अमर आत्मा का परिचय देते हैं, कर्म के कर्तव्य की बात करते हैं, और उस मन का आदर्श रखते हैं जो सुख और दुख दोनों में स्थिर रहे।

ये मन के सवाल जिनसे यह श्लोक जुड़ता है

ऐसे सवाल जो असली लोग मन में उठाते हैं, और जिन पर यह श्लोक कुछ कहता है।

इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।

धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।

2.62 पर धर्म से पूछें