भगवद गीता 3.35
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥
“अपना धर्म अधूरे ढंग से निभाना भी दूसरे का धर्म पूर्णता से निभाने से श्रेयस्कर है। अपने धर्म में मृत्यु भी बेहतर है; दूसरे का धर्म भय से भरा होता है।”- confusion
- career
- purpose
- identity
- comparison
यह श्लोक किस बारे में है
यह श्लोक अपनी दिशा को लेकर उलझन, काम और करियर और अपने रास्ते से जुड़ता है।
✦ चिंतन
तुम्हारा अपना छोटा रास्ता, चाहे अधूरा हो, किसी और के पूर्ण रास्ते से कहीं ज़्यादा जीवंत है।
✦ एक छोटा अभ्यास
आज जब ईर्ष्या उठे, तो अपने काम पर लौट आओ।
अध्याय 3
कर्म योग
क्यों कोई भी कर्म से पूरी तरह बाहर नहीं निकल सकता, और कैसे संसार में कर्म करते हुए भी उससे न बँधा जाए।
ये मन के सवाल जिनसे यह श्लोक जुड़ता है
ऐसे सवाल जो असली लोग मन में उठाते हैं, और जिन पर यह श्लोक कुछ कहता है।
जब करियर को लेकर उलझन हो, तब क्या करूँ?
आप फँसे नहीं हैं, बस अभी तस्वीर साफ़ नहीं है।
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ENदूसरों की कामयाबी देखकर जलन क्यों होती है?
उनकी आगे बढ़ना अपनी हार जैसा लगता है।
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ENसब कुछ ठीक लगने पर भी ज़िंदगी में खोया-खोया क्यों महसूस होता है?
बाहर से सब ठीक है, पर अंदर कुछ है जो सही नहीं लगता।
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EN
इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।
धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।
3.35 पर धर्म से पूछें