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भगवद गीता 3.42

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥

इंद्रियाँ शरीर से श्रेष्ठ कही जाती हैं; इंद्रियों से श्रेष्ठ मन है; मन से श्रेष्ठ बुद्धि है; और बुद्धि से भी श्रेष्ठ आत्मा है।
  • self
  • mind
  • discernment
  • wisdom

यह श्लोक किस बारे में है

यह श्लोक भगवद गीता के अध्याय 3 से है।

चिंतन

तुम अपने विचार नहीं हो। जो हिस्सा उन्हें देख रहा है, वह उनके नीचे एक शांत-सा कुछ है।

एक छोटा अभ्यास

आज तीन बार रुको और पूछो: इस क्षण में जो जागरूक है, वह कौन है?

अध्याय 3

कर्म योग

क्यों कोई भी कर्म से पूरी तरह बाहर नहीं निकल सकता, और कैसे संसार में कर्म करते हुए भी उससे न बँधा जाए।

ये मन के सवाल जिनसे यह श्लोक जुड़ता है

ऐसे सवाल जो असली लोग मन में उठाते हैं, और जिन पर यह श्लोक कुछ कहता है।

इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।

धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।

3.42 पर धर्म से पूछें