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भगवद गीता 4.7
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
“हे भारत, जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।”- dharma
- faith
- hope
यह श्लोक किस बारे में है
यह श्लोक श्रद्धा से जुड़ता है।
✦ चिंतन
तुम्हारी ज़िंदगी के सबसे कठिन दौर में भी, अंदर कुछ चुपचाप संतुलन लौटाने का काम कर रहा होता है।
✦ एक छोटा अभ्यास
किसी पुराने कठिन समय के बारे में सोचो। एक ऐसी बात का नाम लो जो उसने तुम्हें सिखाई, जो किसी और तरह नहीं सीखी जा सकती थी।
अध्याय 4
ज्ञान कर्म संन्यास योग
अर्पण के भाव से किया गया कर्म स्वयं ज्ञान का रूप बन जाता है। यह वही अध्याय है जो बार-बार कहता है, ज्ञान जिसे छूता है, उसे पवित्र कर देता है।
इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।
धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।
4.7 पर धर्म से पूछें