भगवद गीता 6.6
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः। अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥
“जिसने अपने आप पर विजय पाई है, उसके लिए स्वयं मित्र है; पर जिसने स्वयं पर विजय नहीं पाई, उसके लिए स्वयं शत्रु की तरह व्यवहार करता है।”- self
- discipline
- mind
- anxiety
- overthinking
यह श्लोक किस बारे में है
यह श्लोक चिंता से जुड़ता है।
✦ चिंतन
तुम्हारा मन तुम्हारा दोस्त भी हो सकता है और तुम्हें दबाने वाला भी। फ़र्क़ इसमें है कि तुम उससे कैसे बात करते हो।
✦ एक छोटा अभ्यास
आज जब मन तुम्हारे ख़िलाफ़ हो जाए, तो उससे ऐसे बात करो जैसे एक अच्छा दोस्त करता है।
अध्याय 6
ध्यान योग
भीतर का अभ्यास: आसन, मुद्रा, साँस, और चंचल मन को धीरे-धीरे साधने की लम्बी साधना।
ये मन के सवाल जिनसे यह श्लोक जुड़ता है
ऐसे सवाल जो असली लोग मन में उठाते हैं, और जिन पर यह श्लोक कुछ कहता है।
मैं हर बात पर इतना क्यों सोचता हूँ, और इसे कैसे रोकूँ?
कुछ भी ग़लत न हो, फिर भी मन रुकने का नाम नहीं लेता।
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ENजब करियर को लेकर उलझन हो, तब क्या करूँ?
आप फँसे नहीं हैं, बस अभी तस्वीर साफ़ नहीं है।
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ENसब कुछ ठीक लगने पर भी ज़िंदगी में खोया-खोया क्यों महसूस होता है?
बाहर से सब ठीक है, पर अंदर कुछ है जो सही नहीं लगता।
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EN
इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।
धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।
6.6 पर धर्म से पूछें