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भगवद गीता 2.70

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्। तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥

जैसे नदियों का पानी भरे हुए, अचल समुद्र में समा जाता है, वैसे ही स्थिर मन वाले व्यक्ति में सभी इच्छाएँ समा जाती हैं, और वही शांति पाता है, इच्छाओं के पीछे भागने वाला नहीं।
  • peace
  • desire
  • equanimity
  • contentment

यह श्लोक किस बारे में है

यह श्लोक भगवद गीता के अध्याय 2 से है।

चिंतन

तुम्हें चाहना बंद नहीं करना है। बस हर चाहत से इधर-उधर धक्के खाना बंद करना है।

एक छोटा अभ्यास

आज जब कोई इच्छा उठे, तो उसे आने-जाने दो। न उसके पीछे भागो, न उसे धक्का दो।

अध्याय 2

सांख्य योग

कृष्ण यहाँ अमर आत्मा का परिचय देते हैं, कर्म के कर्तव्य की बात करते हैं, और उस मन का आदर्श रखते हैं जो सुख और दुख दोनों में स्थिर रहे।

ये मन के सवाल जिनसे यह श्लोक जुड़ता है

ऐसे सवाल जो असली लोग मन में उठाते हैं, और जिन पर यह श्लोक कुछ कहता है।

इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।

धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।

2.70 पर धर्म से पूछें