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भगवद गीता 2.71

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः। निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति॥

जो व्यक्ति सभी इच्छाओं को त्यागकर, लालसा से मुक्त होकर, ममता और अहंकार से रहित होकर जीवन में चलता है, वही शांति पाता है।
  • peace
  • ego
  • desire
  • contentment

यह श्लोक किस बारे में है

यह श्लोक भगवद गीता के अध्याय 2 से है।

चिंतन

अहंकार हिसाब रखता है कि किसे क्या मिला। इससे तुम्हें शायद ही कभी ज़्यादा खुशी मिले।

एक छोटा अभ्यास

आज एक ऐसी भलाई करो जिसके बारे में कोई न जाने।

अध्याय 2

सांख्य योग

कृष्ण यहाँ अमर आत्मा का परिचय देते हैं, कर्म के कर्तव्य की बात करते हैं, और उस मन का आदर्श रखते हैं जो सुख और दुख दोनों में स्थिर रहे।

ये मन के सवाल जिनसे यह श्लोक जुड़ता है

ऐसे सवाल जो असली लोग मन में उठाते हैं, और जिन पर यह श्लोक कुछ कहता है।

इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।

धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।

2.71 पर धर्म से पूछें